अपने बच्चों से प्रताड़ित बुजुर्ग: समाज का अनकहा दर्द

बुजुर्ग जीवन अनुभव और ज्ञान के स्रोत होते हैं, लेकिन आज के समाज में कई वृद्धजन अपने ही घरों में अपमान, उपेक्षा और शोषण का शिकार हो रहे हैं। यह एक गंभीर सामाजिक समस्या बनती जा रही है, जहां वे बच्चे, जिन्हें उन्होंने पाल-पोसकर बड़ा किया, वही उनके बुढ़ापे को अभिशाप बना रहे हैं।

बुजुर्गों की प्रताड़ना के रूप

बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक शोषण के रूप में भी होता है—

1. मानसिक उत्पीड़न – अपमानजनक भाषा, अनदेखी करना और उन्हें ताने देना।

2. आर्थिक शोषण – उनकी संपत्ति हड़पना, जबरदस्ती संपत्ति या बैंक खाते से पैसा निकालना।

3. शारीरिक प्रताड़ना – धक्का देना, मारपीट करना या उन्हें बुनियादी जरूरतों से वंचित रखना।

4. भावनात्मक उपेक्षा – परिवार में उन्हें अकेला छोड़ देना, संवाद न करना, और प्यार व सम्मान से वंचित रखना।

कारण और सामाजिक बदलाव

पारिवारिक मूल्यों में गिरावट और पश्चिमी प्रभाव से संयुक्त परिवारों का विघटन।

आर्थिक तंगी के चलते बुजुर्गों को बोझ समझना।

युवा पीढ़ी का स्वार्थी दृष्टिकोण और आधुनिक जीवनशैली।

बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए कानूनी उपाय

भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक देखभाल एवं कल्याण अधिनियम, 2007 बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा करता है। इसके तहत—

माता-पिता अपने बच्चों से भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं।

संपत्ति हड़पने के मामलों में कानूनी कार्रवाई संभव है।

राज्य सरकारें वरिष्ठ नागरिकों के लिए हेल्पलाइन और वृद्धाश्रम जैसी सुविधाएँ देती हैं।

समाधान और समाज की भूमिका

बच्चों को नैतिकता और पारिवारिक मूल्यों का शिक्षा देना।

बुजुर्गों के लिए सहायता केंद्र, परामर्श सेवाएँ और सामुदायिक सहयोग बढ़ाना।

सरकार और समाज द्वारा एक ऐसा माहौल तैयार करना, जहाँ बुजुर्गों को प्यार, सुरक्षा और सम्मान मिले।

बुजुर्ग केवल परिवार का नहीं, बल्कि समाज का आधार होते हैं। यदि हम उन्हें सम्मान नहीं देंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी हमें उसी तरह देखेंगी। हमें इस स्थिति को बदलने के लिए अपनी मानसिकता और व्यवहार में बदलाव लाने की जरूरत है।

डॉ मनीष वैद्य। 
सचिव, "वृद्ध सेवा आश्रम",रांची 

"फल न देगा सही छांव तो देगा तुमको। 
पेड़ बूढ़ा ही सही आँगन में लगा रहने दो।।"

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