"जब सेवा बन जाए संस्कार: 'श्रेष्ठ पुत्र रत्न अवार्ड' की ऐतिहासिक पहल"
आज का समाज उन लोगों को सम्मानित करता है जो शिक्षा, चिकित्सा, सेना, खेल, प्रशासन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देते हैं। यह प्रशंसनीय है। परंतु एक मौन, त्यागमयी और गहरी मानवीय सेवा – बुजुर्गों की सेवा – अभी भी उस सम्मान से वंचित है जिसकी वह हकदार है।
माता-पिता, दादा-दादी या अन्य वृद्धजनों की सेवा करने वाले लोग, जो निःस्वार्थ भाव से अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग बुजुर्गों की सेवा में समर्पित कर देते हैं, क्या उन्हें हम सिर्फ "कर्तव्य" कहकर अनदेखा कर सकते हैं?
क्या उन्हें भी किसी राष्ट्रीय स्तर के सम्मान का अधिकारी नहीं माना जाना चाहिए?
एक अनूठी पहल: वृद्ध सेवा आश्रम द्वारा "श्रेष्ठ पुत्र रत्न अवार्ड"
भारत में पहली बार, इस भावनात्मक और सामाजिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय को राष्ट्रीय विमर्श में लाने का कार्य कर रही है "वृद्ध सेवा आश्रम" – झारखंड स्थित एक समर्पित संस्था, जो पिछले दो दशकों से बुजुर्गों के मान-सम्मान और अधिकारों की रक्षा में लगी है।
👉 13 जुलाई 2025 को रांची, झारखंड में "श्रेष्ठ पुत्र रत्न अवार्ड" का आयोजन किया जा रहा है –
यह देश का पहला ऐसा सम्मान होगा जो उन लोगों को दिया जाएगा जिन्होंने अपने माता-पिता या किसी भी वृद्धजन की निःस्वार्थ सेवा की हो, उन्हें वृद्धाश्रम के बजाय अपने दिल और घर में स्थान दिया हो।
इस अवार्ड का उद्देश्य:
1. बुजुर्ग सेवा को सामाजिक गौरव दिलाना।
2. सेवाभावी संतानों को प्रेरणा-स्त्रोत के रूप में पहचान देना।
3. नई पीढ़ी में सेवा और करुणा के संस्कार विकसित करना।
4. समाज को यह एहसास दिलाना कि यह भी एक ‘राष्ट्रीय सेवा’ है।
समाज पर इसका संभावित प्रभाव:
संवेदनशील और संस्कारी समाज का निर्माण होगा जहाँ बुजुर्ग उपेक्षित नहीं, बल्कि आदर और सेवा के पात्र होंगे।
यह सम्मान एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम बनेगा, जहाँ "संस्कार" और "कर्तव्य" को खोखले आदर्श नहीं, बल्कि व्यवहार में लाया जाएगा।
राज्य और केंद्र सरकारें भी इस दिशा में सकारात्मक नीति निर्माण को प्रेरित हो सकती हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर इसे बनाने का संकल्प
"वृद्ध सेवा आश्रम" की यह पहल एक आयोजन भर नहीं, बल्कि एक आंदोलन है।
हमारा लक्ष्य है कि –
🟢 आने वाले वर्षों में यह सम्मान हर राज्य में आयोजित हो,
🟢 राष्ट्रपति पदक या पद्म पुरस्कार जितनी प्रतिष्ठा इसे प्राप्त हो,
🟢 और एक दिन ऐसा भी आए जब यह भारतीय परिवार व्यवस्था को सशक्त करने वाला सबसे बड़ा सामाजिक सम्मान बन जाए।
निष्कर्ष:
जब हम देश की सेवा करने वाले सैनिकों को सम्मानित करते हैं, शिक्षकों को अभिनंदन करते हैं, डॉक्टरों को पदक देते हैं –
तो क्या एक ऐसे बेटे या बहू को नहीं सम्मानित किया जाना चाहिए, जिसने अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा को अपना जीवनधर्म बना लिया हो?
"श्रेष्ठ पुत्र रत्न अवार्ड" केवल एक ट्रॉफी नहीं, बल्कि एक सोच है –
एक प्रयास कि हम उन कंधों को नमन करें, जो कभी हमें चलना सिखाते थे, और अब हमारी सेवा के पात्र हैं।
तो आइए, इस ऐतिहासिक पहल का हिस्सा बनें।
13 जुलाई 2025 को झारखंड की धरती से उठने वाली यह ज्योति पूरे भारत में सेवा, संस्कार और सम्मान का दीप जला दे – यही हमारी प्रार्थना है।
मनीष वैद्य
सचिव
वृद्ध सेवा आश्रम (VSA)