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"जब सेवा बन जाए संस्कार: 'श्रेष्ठ पुत्र रत्न अवार्ड' की ऐतिहासिक पहल"

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आज का समाज उन लोगों को सम्मानित करता है जो शिक्षा, चिकित्सा, सेना, खेल, प्रशासन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देते हैं। यह प्रशंसनीय है। परंतु एक मौन, त्यागमयी और गहरी मानवीय सेवा – बुजुर्गों की सेवा – अभी भी उस सम्मान से वंचित है जिसकी वह हकदार है। माता-पिता, दादा-दादी या अन्य वृद्धजनों की सेवा करने वाले लोग, जो निःस्वार्थ भाव से अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग बुजुर्गों की सेवा में समर्पित कर देते हैं, क्या उन्हें हम सिर्फ "कर्तव्य" कहकर अनदेखा कर सकते हैं? क्या उन्हें भी किसी राष्ट्रीय स्तर के सम्मान का अधिकारी नहीं माना जाना चाहिए? एक अनूठी पहल: वृद्ध सेवा आश्रम द्वारा "श्रेष्ठ पुत्र रत्न अवार्ड" भारत में पहली बार, इस भावनात्मक और सामाजिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण विषय को राष्ट्रीय विमर्श में लाने का कार्य कर रही है "वृद्ध सेवा आश्रम" – झारखंड स्थित एक समर्पित संस्था, जो पिछले दो दशकों से बुजुर्गों के मान-सम्मान और अधिकारों की रक्षा में लगी है। 👉 13 जुलाई 2025 को रांची, झारखंड में "श्रेष्ठ पुत्र रत्न अवार्ड" का आयोजन क...

"माँ अब भी मुस्कराती है…"

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उसकी झुकी हुई कमर और कांपते हाथों से अब भी एक दुआ निकलती है – अपने बच्चों की सलामती की। उसके चेहरे की झुर्रियाँ कोई साधारण रेखाएं नहीं, वो जीवन की संघर्षगाथा हैं। साड़ी के पल्लू में छिपी शर्म नहीं, बल्कि वर्षों की चुप्पी है, जो कहती है — "बेटा, तुम तो बड़े हो गए, पर क्या इंसान भी बने?" यह तस्वीर एक बुजुर्ग माँ की नहीं, पूरे समाज की संवेदनहीनता की तस्वीर है। जिसने पाल-पोसकर बच्चों को इस काबिल बनाया कि वो उड़ सकें, पर जब वो चलने लायक नहीं रही, तो बेटा उड़ गया… और माँ अकेली रह गई। 🍂 बेटों ने कहा: "अब कहाँ संभाल पाएंगे, काम बहुत है..." 🌪️ बेटियों ने सोचा: "ससुराल की जिम्मेदारियाँ हैं, क्या करें..." पर माँ ने कुछ नहीं कहा। वो चुप रही। सिर्फ मुस्कराई — उसी झुकी कमर, उसी कांपते हाथ और फटे आँचल में भी दुआओं की दौलत लिए। ❝ माँ कोई बोझ नहीं होती... ❞ वो तो वो दीवार है, जो तूफानों में भी दरकती नहीं, वो तो वो छाँव है, जो धूप में भी सुकून देती है। आज अगर वह किसी वृद्धाश्रम के कोने में बैठकर अपने ही बच्चों की तस्वीरों को ताक रही है, तो दोष सिर्फ उस माँ का ...

धर्म या कर्म: कौन अधिक महत्वपूर्ण?

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मनुष्य के जीवन में धर्म और कर्म दोनों ही अत्यंत आवश्यक हैं, पर जब प्रश्न आता है – धर्म बड़ा या कर्म, तो उत्तर सीधा नहीं, गहराई से विचार करने योग्य है। धर्म क्या है? धर्म का अर्थ अक्सर संप्रदाय, पूजा-पद्धति या रीति-रिवाजों से जोड़ दिया जाता है, जबकि मूलतः धर्म का अर्थ है – कर्तव्य, मर्यादा, और सच्चाई के मार्ग पर चलना। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा भी है – “धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे”, अर्थात जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ। कर्म क्या है? कर्म का अर्थ है कृया, कार्य या प्रयास। जो हम हर दिन करते हैं – वह कर्म है। हमारी सोच, हमारी नीयत और हमारे कार्य – सब कुछ हमारे कर्म के दायरे में आता है। गीता में ही श्रीकृष्ण ने कहा – “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”, यानी मनुष्य को केवल अपने कर्म करने का अधिकार है, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। धर्म बिना कर्म अधूरा है, और कर्म बिना धर्म दिशाहीन यदि कोई केवल धर्म का पालन करता है पर अपने कर्मों में ईमानदार नहीं है, तो उसका धर्म केवल दिखावा है। और यदि कोई कर्मशील है, पर उसके कर्मों में नैत...

बढ़ती संवेदनहीनता: आधुनिक समाज की चुप्पी क्यों?

एक समय था जब किसी के घर दुःख आता था, तो पूरा मोहल्ला दुःखी हो जाता था। किसी को चोट लगती थी, तो हर हाथ मलहम बनकर आगे बढ़ता था। लेकिन आज? आज हम दर्द को कैमरे में कैद करते हैं, संवेदना को स्टेटस में डालते हैं, और फिर आगे बढ़ जाते हैं। आज के समय की सबसे बड़ी सामाजिक त्रासदी यही है – संवेदनहीनता की महामारी। घटनाएं जो चौंकाती नहीं, बल्कि आदत बन गई हैं... रेलवे स्टेशन पर एक वृद्ध महिला भूख से बेहोश पड़ी रही, लोग उसके बगल से गुजरते रहे… स्कूल से लौटता बच्चा एक्सीडेंट में गिर पड़ा, भीड़ तमाशबीन बनी रही… एक महिला घरेलू हिंसा का शिकार होती रही, पड़ोसी दीवारों से कान सटाए रहे, लेकिन आवाज नहीं उठी… क्या हमारा समाज अब केवल “देखता” है, “महसूस” नहीं करता? संवेदनहीनता के पीछे छिपे कारण 1. डिजिटल युग की दीवारें: हम ऑनलाइन जुड़ते जा रहे हैं, लेकिन दिलों से कटते जा रहे हैं। स्मार्टफोन में तो दुनिया है, पर पड़ोसी का हाल तक नहीं पता। 2. खुद की सुरक्षा का डर: लोग डरते हैं—अगर किसी की मदद की, तो कहीं उलझ न जाएं, पुलिस केस न हो जाए। 3. जीवन की आपाधापी: हर कोई भाग रहा है। समय नहीं, धैर्य नहीं, न ही अपने बाहर दे...

"संघर्ष की गोद में शिक्षा – आशा की एक किरण

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"वृद्ध सेवा आश्रम, रांची 🌿 की ओर से... एक झोपड़ी, टूटी फूटी जमीन, और मां की गोद में पलता भविष्य – यह दृश्य हमें यह सोचने पर विवश करता है कि संसाधनों की कमी के बावजूद यदि इच्छा हो, तो शिक्षा की लौ हर अंधेरे को चीर सकती है। आज जब हम वृद्ध सेवा आश्रम, रांची 🌿 में बुजुर्गों की सेवा करते हैं, तो यह दृश्य हमें हमारे मिशन की जड़ से जोड़ता है – "सम्मान, सेवा और संवेदना"। जिस मां ने अपने बेटे को गोद में बैठाकर, खुद अनपढ़ होते हुए भी अक्षर ज्ञान देने की कोशिश की, वही मां एक दिन वृद्धावस्था में समाज की उपेक्षा झेले, यह अन्याय है। हम क्या कह रहे हैं? 👉 शिक्षा सिर्फ स्कूलों में नहीं, संस्कारों से भी मिलती है। 👉 जो मां-बाप हमें चलना, बोलना, पढ़ना सिखाते हैं – क्या हम उन्हें बुजुर्ग होने पर भुला देते हैं? 👉 अगर इस चित्र में दिख रही मां एक दिन अकेली रह जाए, तो क्या हम जैसे समाज का कोई दायित्व नहीं बनता? हमारा आह्वान – एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सम्मान की परंपरा वृद्ध सेवा आश्रम, रांची 🌿 सिर्फ एक संस्था नहीं, एक आंदोलन है – जिसका उद्देश्य है कि हर बुजुर्ग को सम्मान और स...

शहरीकरण: सुविधा या संवेदनहीनता?लेखक: डॉ. मनीष वैद्य।

जब हम गाँवों की शांति और अपनत्व से निकलकर शहर की तेज रफ्तार जिंदगी में कदम रखते हैं, तो एक सवाल मन में जरूर उठता है क्या हम विकास की ओर जा रहे हैं या केवल भीड़ में खोने? शहरीकरण ने हमें ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, एयर कंडीशनर वाले दफ्तर और हर पल इंटरनेट से जुड़ा जीवन दिया है। लेकिन इन सबके बीच, क्या हम वो खो बैठे हैं, जिसे "समाज" कहा जाता था? विकास की दौड़ में अकेलेपन का बढ़ता साया शहरों में भले ही हर चीज ‘फास्ट’ हो गई हो, इंटरनेट से लेकर खाना और गाड़ियाँ तक लेकिन रिश्ते धीरे-धीरे ‘स्लो’ हो गए हैं। अब दूसरे के सुख-दुख में शामिल होना समय की बर्बादी माना जाता है। पड़ोसी कौन है? ये भी लोग गूगल से जानना चाहते हैं। वृद्धजन – शहर में सबसे अकेले इंसान शहरीकरण ने जिन लोगों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, वो हैं हमारे वृद्धजन। जहां पहले उन्हें घर का मुखिया और मार्गदर्शक माना जाता था, अब वे कमरे में बंद, पुराने मोबाइल में घूरते हुए दिखाई देते हैं। क्या यही है आधुनिकता? बचपन – जो अब गली में नहीं, गैजेट में बीतता है जहां पहले शाम का मतलब था – गली क्रिकेट, पतंग, छुपन-छुपाई; अब वही शाम फो...

अमीर समय को बचाते हैं, गरीब पैसा – सोच का फर्क! लेखक: डॉ. मनीष वैद्य

विषय: सोच, समय और समृद्धि का गहरा रिश्ता हम सब दौड़ रहे हैं — कोई पैसे के पीछे, कोई समय के पीछे। फर्क इस बात में नहीं कि दौड़ किस दिशा में है, फर्क इस बात में है कि हम क्या समझकर दौड़ रहे हैं। समाज में एक बड़ा मानसिक अंतर देखने को मिलता है: अमीर लोग समय को सर्वोपरि मानते हैं, जबकि गरीब लोग पैसे को। यह वाक्य सुनने में सामान्य सा लग सकता है, लेकिन इसका अर्थ बहुत गहरा है। यह सिर्फ आर्थिक स्थिति की नहीं, जीवन के प्रति सोच और दृष्टिकोण की बात है। समय की कीमत: अमीर की सोच अमीर व्यक्ति जानता है कि पैसा दोबारा कमाया जा सकता है, लेकिन समय कभी वापस नहीं आता। इसलिए वह हर उस कार्य से बचता है जो उसके समय को खा जाता है पर मूल्य नहीं जोड़ता। वह टेक्नोलॉजी और टीमों का प्रयोग करता है। वह अपने कौशल और निर्णय क्षमता को बढ़ाने पर समय खर्च करता है। वह समय को इन्वेस्टमेंट मानता है — ऐसा निवेश जो भविष्य को बना सकता है। एक बिजनेस टाइकून का एक घंटा लाखों का हो सकता है, तो वह सोच-समझकर तय करता है कि वह हर मिनट कहां और कैसे लगाएगा। पैसे की प्राथमिकता: गरीब की सोच वहीं, गरीब व्यक्ति अकसर सोचता है — “थोड़ा सा पैसा...